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बिजली की झालरों की चमक में फीकी पड़ी मिट्टी के कारीगरों की उम्मीदें, काशीपुर के कुम्हारों का दीपावली पर संघर्ष जारी

The hopes of clay artisans faded in the glow of electric lights, the struggle of potters of Kashipur continues on Diwali

काशीपुर में दीपावली का त्यौहार कुम्हारों के लिए साल का सबसे महत्वपूर्ण समय होता है, क्योंकि इस दौरान मिट्टी के दीयों, चिरागों, करवों, और बर्तनों की बिक्री से ही उन्हें अपने परिवार का गुजारा करना होता है। लेकिन इस साल भी कुम्हारों का संघर्ष बरकरार है। आधुनिकता और बाजार में सस्ती इलेक्ट्रॉनिक झालरों के चलन ने उनकी मेहनत और परंपरा को मुश्किल में डाल दिया है।

तीन महीने की मेहनत पर पानी

काशीपुर के दक्ष प्रजापति चौक में बसे कुम्हार परिवार दीपावली के तीन महीने पहले से ही मिट्टी के दीये, चिराग, हठली, और अन्य सजावटी सामान बनाना शुरू कर देते हैं। आदेश प्रजापति, जो खुद एक कुम्हार हैं, बताते हैं कि वे दिन-रात मेहनत कर के हर आकार और डिजाइन के दीये तैयार करते हैं। उनकी आशा होती है कि दीपावली के दौरान उनकी मेहनत का फल मिलेगा। हालांकि, जब ये कारीगर अपने बनाए हुए दीये लेकर बाजार पहुंचते हैं, तो ग्राहक उनकी कला की कदर कम और इलेक्ट्रॉनिक दीयों की ओर आकर्षित होते हैं।

मिट्टी के दीयों की कीमत पर मोलभाव

कारीगरों का कहना है कि आजकल लोग मिट्टी के दीयों की कीमत पर मोलभाव कर रहे हैं, मानो ये कोई सजावटी सामान हो। महिपाल, एक अन्य कुम्हार, बताते हैं कि कई ग्राहक उनके मेहनत से बने दीयों के प्रति वैसा सम्मान नहीं दिखाते और ज्यादातर ग्राहक फैंसी और बिजली की झालरों को तरजीह देते हैं। इससे उनकी बिक्री पर बहुत बड़ा असर पड़ा है।

बिजली की झालरों ने बदल दी परंपरा

कुम्हारों के मुताबिक, हर साल बाजार में चाइनीज झालरों और इलेक्ट्रॉनिक दीयों की मांग बढ़ती जा रही है। इन बिजली की झालरों की चमक-धमक ने परंपरागत मिट्टी के दीयों की जगह ले ली है। इसके चलते कुम्हारों की चाक की रफ्तार अब बहुत धीमी हो गई है। दीपावली का त्यौहार, जो उनके लिए एक नई उम्मीद लेकर आता था, अब बस एक संघर्ष का प्रतीक बन गया है।

अपने अस्तित्व को बचाने की कोशिश

कुम्हार अब भी इस उम्मीद में हैं कि लोग परंपरागत मिट्टी के दीयों की ओर लौटेंगे और उनकी मेहनत का मोल समझेंगे। हालांकि, आधुनिकता की चकाचौंध और बिजली की सजावट के कारण उनकी उम्मीदें धुंधली पड़ती जा रही हैं। कुम्हारों का मानना है कि यदि लोग मिट्टी के दीयों का महत्व समझें और इन्हें अपनाएं, तो यह परंपरा बचेगी और कुम्हारों का भी भविष्य सुरक्षित रहेगा।

पारंपरिक कारीगरी के अस्तित्व पर सवाल

इस दीपावली पर काशीपुर के कुम्हारों का संघर्ष उनकी पारंपरिक कला और संस्कृति के अस्तित्व का सवाल भी खड़ा करता है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या लोग अपनी संस्कृति और परंपराओं को संजोने के लिए मिट्टी के दीयों की ओर लौटेंगे या फिर आधुनिकता की रोशनी में पारंपरिक कारीगरी खोती चली जाएगी।

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