2024: संघर्ष के आंकड़े चिंताजनक, 64 लोगों की मौत, 342 घायल
इस साल उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष के कुल 406 मामले सामने आए। इनमें 64 लोगों की मौत हुई और 342 लोग घायल हुए। सबसे ज्यादा घटनाएं जुलाई और अगस्त में दर्ज की गईं, जब 11-11 लोगों की जान गई। सितंबर में 70 लोग घायल हुए, जो साल का सबसे बड़ा आंकड़ा है।
24 वर्षों में दोगुना हुआ मौतों का आंकड़ा
साल 2000 में सालाना 30 मौतों का औसत अब 2024 में 60 तक पहुंच गया। घायलों की संख्या भी चार गुना बढ़कर 250-300 के बीच हो गई। गुलदार और बाघों के हमलों में बढ़ोतरी मुख्य कारण बनी। इस साल 4 गुलदार को मारने और 79 को पिंजरे में बंद करने के आदेश जारी हुए।
जन जागरूकता: संघर्ष रोकने का एकमात्र उपाय
वन विभाग ने मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकने के लिए जन जागरूकता कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया। ये कार्यक्रम ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में समान रूप से चलाए गए। विभाग का मानना है कि जागरूकता ही इस समस्या का स्थायी समाधान है।
तकनीकी उपायों से संघर्ष रोकने की कोशिश
ड्रोन, कैमरा ट्रैप और बी-हाई फेंसिंग जैसे तकनीकी उपायों का इस्तेमाल वन्यजीवों की निगरानी और शहरी इलाकों में उनके प्रवेश को रोकने के लिए किया जा रहा है। वन्यजीवों की गिनती और उनके आवास क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण भी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
प्रभावितों को राहत: मुआवजा राशि बढ़ी
राज्य सरकार ने मानव-वन्यजीव संघर्ष से प्रभावित लोगों के लिए मुआवजा राशि 4 लाख से बढ़ाकर 6 लाख रुपये कर दी। इसके अलावा 2 करोड़ रुपये का कॉरपस फंड भी स्थापित किया गया।
नई योजनाएं और टोल-फ्री हेल्पलाइन सक्रिय
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अधिकारियों को फील्ड में जाकर प्रभावितों से संवाद करने के निर्देश दिए। संघर्ष से निपटने के लिए एक नई विंग बनाई गई और टोल-फ्री हेल्पलाइन को डिजिटल नेटवर्क से जोड़ा गया, ताकि शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई हो सके।
विशेषज्ञों की राय: मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने के लिए दीर्घकालिक रणनीति की जरूरत
वन्यजीव विशेषज्ञों ने संघर्ष के बढ़ते मामलों पर चिंता जताई और इसे रोकने के लिए ठोस दीर्घकालिक योजनाओं की आवश्यकता पर जोर दिया। वन विभाग और सरकार के प्रयास सराहनीय हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर और अधिक काम की आवश्यकता है।