प्रयागराज, उत्तर प्रदेश: महाकुंभ मेला 2025 में एक ओर जहां आस्था का अद्भुत दृश्य देखने को मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर, गुरुकुल शिक्षा पद्धति से जुड़े शिष्य-गुरु का संगम भी नज़र आ रहा है। संगम तट पर गंगा-यमुन के संगम के बीच गुरुकुल के शिष्य अपने गुरु के साथ आस्था की डुबकी लगा रहे हैं और धर्म की शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।
आचार्य रुपेश कुमार झा का संकल्प: 108 गुरुकुल खोलने का लक्ष्य
महाकुंभ में पहुंचे आचार्य रुपेश कुमार झा ने बताया कि उनका मुख्य उद्देश्य पूरे मिथिलांचल और बिहार में 108 गुरुकुल खोलने का है। आचार्य ने अपनी शिक्षा यात्रा में 7 बार यूजीसी नेट और 2 बार जेआरएफ क्वालीफाई किया है, साथ ही उन्होंने तीन सरकारी नौकरियां छोड़ दीं। अब वे सनातन धर्म के उत्थान में जुटे हैं और बच्चों को संस्कृत और भारतीय संस्कृति से जोड़ने के लिए काम कर रहे हैं।
महाकुंभ में स्नान: बच्चों की आस्था और सौभाग्य का प्रतीक
आचार्य ने यह भी बताया कि उनके साथ 25 बच्चे महाकुंभ में स्नान करने आए हैं, और यह उनके लिए एक सौभाग्य की बात है। इन बच्चों को संस्कृत की शिक्षा दी जा रही है, और वे महामृत्युंजय मंत्र का उच्चारण करते हुए गंगा में स्नान कर रहे हैं। आयुष कुमार झा जैसे नन्हे शिष्य ने संस्कृत श्लोकों का सही उच्चारण किया, और महाकुंभ में स्नान के बाद उन्होंने अपनी संतुष्टि और आस्था व्यक्त की।
संस्कृत शिक्षा: आचार्य और शिष्य का साझा प्रयास
महाकुंभ में पहुंचे अन्य शिष्य जैसे गौरव कुमार मिश्रा और अमोल कुमार झा ने भी अपने विचार साझा किए। गौरव ने कहा कि सनातन धर्म को उन्नत करने के लिए हम सभी को एकजुट होकर काम करना होगा, जबकि अमोल ने बताया कि हमें संस्कृत के साथ-साथ आधुनिकता को भी साथ लेकर चलना होगा, ताकि हम समाज की बदलती जरूरतों के अनुसार धर्म को प्रासंगिक बना सकें।
इंग्लिश माध्यम की पढ़ाई छोड़, गुरुकुल की ओर रुख किया शशि शेखर ने
गुरुकुल के शिष्य शशि शेखर ने इंग्लिश माध्यम की पढ़ाई छोड़कर संस्कृत शिक्षा ग्रहण करने का निर्णय लिया। उनका मानना है कि संस्कृत देववाणी है और यह हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा है। वे आगे चलकर संस्कृत को जागरूक करने के लिए काम करेंगे।
महाकुंभ: धर्म, शिक्षा और संस्कृत का अद्भुत संगम
महाकुंभ मेला न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, शिक्षा और आध्यात्मिकता के पुनर्निर्माण का अवसर भी बन चुका है। यहां शिष्य और गुरु एक साथ आकर धर्म के प्रचार-प्रसार का संकल्प ले रहे हैं, और यह दिखा रहे हैं कि संस्कृत और सनातन धर्म के साथ-साथ समाज की समृद्धि के लिए आधुनिकता की भी आवश्यकता है।