देहरादून: उत्तराखंड अपनी ऊर्जा क्षमताओं को बढ़ाने के लिए सोलर एनर्जी के साथ अब जियोथर्मल एनर्जी पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। राज्य सरकार ने पायलट प्रोजेक्ट के तहत प्रदेश में जियोथर्मल पावर प्लांट स्थापित करने का निर्णय लिया है। इसके लिए आइसलैंड सरकार के साथ टेक्नोलॉजी साझा करने और फिजिबिलिटी स्टडी के लिए समझौता (एमओयू) करने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है।
2000 मेगावाट उत्पादन की संभावना
उत्तराखंड में 40 तप्त कुंड चिन्हित किए गए हैं, जिनमें गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्रों के तपोवन और बदरीनाथ प्रमुख हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य में लगभग 2000 मेगावाट बिजली का उत्पादन जियोथर्मल एनर्जी से किया जा सकता है। चमोली जिले के तपोवन में ही 5 मेगावाट तक बिजली उत्पादन की क्षमता है।
आइसलैंड दौरे से मिली दिशा
राज्य के अधिकारियों ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर आइसलैंड का दौरा कर वहां के पावर प्लांट्स और तकनीकों का अध्ययन किया। इस दौरे के बाद तय हुआ कि उत्तराखंड में जियोथर्मल पावर प्लांट स्थापित करने के लिए आइसलैंड सरकार की तकनीकी मदद ली जाएगी।
एमओयू प्रक्रिया अंतिम चरण में
ऊर्जा सचिव आर मीनाक्षी सुंदरम ने बताया कि विदेश मंत्रालय और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) से आवश्यक मंजूरी मिल गई है। पर्यावरण मंत्रालय की क्वेरी का जवाब भी दिया जा चुका है। अगले 15-20 दिनों में एमओयू साइन होने की उम्मीद है।
ड्रिलिंग और फिजिबिलिटी स्टडी पर जोर
पायलट प्रोजेक्ट के तहत फिजिबिलिटी स्टडी के लिए बदरीनाथ और तपोवन में ड्रिलिंग की योजना बनाई गई है। इस प्रक्रिया पर 3-4 करोड़ रुपये का खर्च संभावित है। इसका वित्तीय प्रबंधन उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड (यूजेवीएनएल) द्वारा किया जाएगा।
ओएनजीसी की भी दिलचस्पी
तेल और प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) ने भी उत्तराखंड में जियोथर्मल पावर प्लांट लगाने की इच्छा जताई है। इसके लिए अलग से एमओयू साइन करने की योजना है।
पर्यावरणीय सुरक्षा और ऊर्जा में आत्मनिर्भरता
यह परियोजना पर्यावरणीय नुकसान के बिना ऊर्जा उत्पादन का उदाहरण बनेगी। सरकार का मानना है कि इससे राज्य में हरित ऊर्जा के नए द्वार खुलेंगे और उत्तराखंड को ऊर्जा प्रदेश बनाने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम होगा।