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राज्यसभा में 42वें और 44वें संविधान संशोधन पर गरमाया माहौल, निर्मला सीतारमण और जयराम रमेश के बीच तकरार

The atmosphere in Rajya Sabha heated up on the 42nd and 44th constitutional amendments, a dispute between Nirmala Sitharaman and Jairam Ramesh

नई दिल्ली: राज्यसभा में सोमवार को संविधान के 42वें और 44वें संशोधन को लेकर बहस के दौरान केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण और कांग्रेस नेता जयराम रमेश के बीच तीखी नोकझोंक हुई। यह बहस ‘भारतीय संविधान के 75 वर्षों की गौरवशाली यात्रा’ विषय पर हो रही थी, जिसमें इमरजेंसी के दौरान किए गए संवैधानिक संशोधनों पर चर्चा छिड़ी।

सीतारमण का आरोप: 42वें संशोधन का दुरुपयोग

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इमरजेंसी के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में पारित 42वें संविधान संशोधन पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसे पारित कराने के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को नजरअंदाज किया गया। उन्होंने कहा, “विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया गया और राज्यसभा में एक भी सदस्य ने इसका विरोध नहीं किया। लोकसभा में सिर्फ पांच सदस्यों ने इसके खिलाफ बोला।”

उन्होंने यह भी कहा कि जब 1977 के लोकसभा चुनाव में जनता ने इंदिरा गांधी को सबक सिखाया, तो उन्होंने 42वें संशोधन के विवादास्पद प्रावधानों को निरस्त करने वाले 44वें संशोधन का समर्थन किया।

रमेश का पलटवार: इंदिरा गांधी ने अपनी गलती मानी

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सीतारमण पर तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का आरोप लगाया। रमेश ने कहा, “इंदिरा गांधी ने 1978 में 44वें संशोधन का समर्थन किया था, जिसमें 42वें संशोधन के कुछ हिस्सों को हटाने का प्रस्ताव था। उन्होंने महसूस किया कि इन प्रावधानों के कारण ही उन्हें चुनाव में हार का सामना करना पड़ा।”

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जब 44वां संशोधन पारित हुआ था, तब मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री थे, न कि इंदिरा गांधी।

नेता सदन का हस्तक्षेप और सीतारमण का जवाब

जयराम रमेश के बयान पर सदन के नेता जे पी नड्डा ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि 44वां संशोधन मोरारजी देसाई के कार्यकाल में पारित हुआ था। रमेश ने इस पर सहमति जताई और कहा कि उन्होंने कभी नहीं कहा कि इंदिरा गांधी उस समय प्रधानमंत्री थीं।

इसके बाद सीतारमण ने रमेश और नड्डा की बात को स्वीकारते हुए कहा, “नेता सदन और जयराम रमेश दोनों सही हैं। इंदिरा गांधी ने चुनावी हार के बाद 42वें संशोधन में बदलाव का समर्थन किया था।”

42वें और 44वें संशोधन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

42वें संविधान संशोधन, जिसे “मिनी संविधान” भी कहा जाता है, 1976 में लागू किया गया था। इसमें संविधान में तीन नए शब्द “समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और अखंडता” जोड़े गए थे। इस संशोधन को पारित करने के दौरान विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया गया था।

1978 में, मोरारजी देसाई की सरकार ने 44वें संशोधन के जरिए 42वें संशोधन के कुछ विवादास्पद प्रावधानों को हटाया। इसे “आपातकाल सुधार संशोधन” के नाम से भी जाना जाता है।

संसद में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की अहमियत पर जोर

इस बहस के दौरान इमरजेंसी और उसके प्रभावों पर भी चर्चा हुई। सीतारमण ने कहा कि 42वें संशोधन ने लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कमजोर किया, जबकि 44वें संशोधन के जरिए इनकी बहाली का प्रयास किया गया।

निष्कर्ष:

संसद में हुई यह बहस एक बार फिर 1975-77 के आपातकाल के दौर और उसके बाद हुए संवैधानिक बदलावों को उजागर करती है। 42वें और 44वें संशोधन पर चर्चा ने इस बात को रेखांकित किया कि संविधान को समय-समय पर कैसे राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार बदला गया, और लोकतंत्र की रक्षा के लिए कैसे सुधार किए गए।

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