आर्थिक तंगी के बावजूद नहीं हारी हिम्मत, रेशम पालन से पाई नई पहचान
असम के कोकराझार जिले के बोरशीझोरा गांव की बेहुला ब्रह्मा ने अपनी मेहनत और लगन से यह साबित कर दिया कि आत्मनिर्भरता का रास्ता कभी भी अपनाया जा सकता है। आर्थिक कठिनाइयों के चलते आठवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी, लेकिन उन्होंने परिस्थितियों से हार मानने के बजाय रेशम पालन को अपना रोजगार बनाया। आज वह प्रति वर्ष 1.30 लाख रुपये तक की कमाई कर रही हैं और अन्य ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा बन गई हैं।
रेशम पालन से मिली आर्थिक स्थिरता
बेहुला ब्रह्मा ने अपने इस सफर की शुरुआत बोड़ोलैंड प्रादेशिक क्षेत्र (बीटीआर) के रेशम उत्पादन विभाग से प्रशिक्षण लेकर की। इसके बाद उन्होंने अपने स्तर पर 49 किलो ककून को 820 रुपये प्रति किलोग्राम और 245 किलो प्यूपा को 368 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेचना शुरू किया। इससे उन्हें आर्थिक मजबूती मिली और उनका परिवार बेहतर जीवन जीने लगा।
असम में रेशम पालन से हजारों परिवारों को रोजगार
रेशम उद्योग असम के ग्रामीण इलाकों में रोजगार का एक बड़ा जरिया बन चुका है।
✅ 1658 गांवों में फैला रेशम उत्पादन
✅ 44,000 से अधिक लोग रेशम उद्योग से जुड़े
✅ 44,250 परिवारों को मिला रोजगार और आर्थिक लाभ
बोड़ोलैंड रेशम मिशन ने बढ़ाई उत्पादन क्षमता
राज्य सरकार द्वारा रेशम उद्योग को प्रोत्साहित करने के लिए बोड़ोलैंड रेशम मिशन शुरू किया गया। इस पहल से 2023-24 में 1505 मीट्रिक टन कच्चे रेशम का उत्पादन हुआ, जिसे 2026-27 तक 2000 मीट्रिक टन तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।
भारत बना रेशम उत्पादन में वैश्विक शक्ति
भारत चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कच्चा रेशम उत्पादक देश बन चुका है।
🔹 2023-24 में भारत का वैश्विक रेशम उत्पादन में 42% योगदान
🔹 भारत और चीन मिलकर कुल 95% वैश्विक उत्पादन करते हैं
🔹 भारत का कुल रेशम उत्पादन – 38,913 मीट्रिक टन (2023-24)
बेहुला ब्रह्मा की सफलता बनीं ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा
बेहुला ब्रह्मा की सफलता की कहानी यह दिखाती है कि यदि लगन और मेहनत से काम किया जाए, तो कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती। उन्होंने न सिर्फ अपने जीवन को संवारा, बल्कि गांव की अन्य महिलाओं को भी स्वरोजगार के लिए प्रेरित किया। उनकी उपलब्धि असम के ग्रामीण क्षेत्रों में महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता का आदर्श बन चुकी है।