चमोली (उत्तराखंड): भारत का प्रथम गांव माणा, समुद्र तल से 3,200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और अपनी प्राकृतिक सुंदरता, पौराणिक महत्व और सांस्कृतिक धरोहर के कारण विशेष पहचान रखता है। यह गांव भोटिया जनजाति का प्रमुख निवास स्थान है और बदरीनाथ धाम के पास होने के कारण धार्मिक आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र भी है। अब, हाल ही में यहां स्थापित पांडवों की विशाल धातु की मूर्तियां पर्यटकों के लिए नया आकर्षण बन गई हैं और माणा की शांति और अनोखी सुंदरता को देशभर में और प्रसिद्ध कर रही हैं।
पांडवों के स्वर्गारोहण की कथा को सजीव करती मूर्तियांmna
माणा गांव की पहचान अब यहां लगी पांच पांडवों की धातु की मूर्तियों से और गहरी हो गई है। महाभारत की कथाओं के अनुसार, इसी मार्ग से पांडवों ने स्वर्गारोहण का रास्ता तय किया था। यह वही मार्ग है, जहां से पांडव अपनी पत्नी द्रौपदी के साथ हिमालय की ओर बढ़े थे। स्वर्गारोहण के दौरान एक-एक करके पांडव और द्रौपदी इस मार्ग पर अपनी देह का त्याग करते गए, और अंततः युधिष्ठिर अपने साथ आए श्वान (कुत्ते) के साथ स्वर्ग पहुंचे। इन विशाल मूर्तियों को इस पौराणिक कथा को जीवंत करने के उद्देश्य से बड़े कौशल और भव्यता के साथ बनाया गया है। ये मूर्तियां माणा आने वाले श्रद्धालुओं के लिए स्वर्गारोहिणी कथा की गूंज को पुनर्जीवित करती हैं और इस स्थान को पौराणिक धरातल पर नए रूप में प्रस्तुत करती हैं।
पौराणिक महत्व और पर्यटकों का आकर्षण
माणा गांव न केवल बदरीनाथ धाम से धार्मिक रूप से जुड़ा है, बल्कि यह स्थल पौराणिक कथाओं से भी ओतप्रोत है। बदरीनाथ धाम आने वाले श्रद्धालु इस पवित्र गांव की यात्रा करना अपना सौभाग्य मानते हैं। अब यहां स्थापित पांच पांडवों के अलावा द्रौपदी और युधिष्ठिर के साथ उनके श्वान की मूर्तियां गांव में पर्यटन को बढ़ावा दे रही हैं। अलग-अलग धातुओं से निर्मित इन मूर्तियों का वजन लगभग 13 क्विंटल है और वे दूर से ही पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करती हैं। इन मूर्तियों के कारण अब माणा गांव को एक नई पहचान मिल रही है और स्थानीय लोग भी अपने गांव को इस सांस्कृतिक धरोहर के रूप में गर्व से देख रहे हैं।
मूर्तियों की स्थापना और माणा को मिली नई पहचान
माणा गांव में इन मूर्तियों की स्थापना पुणे के एमआईटी संस्थान के संस्थापक और अध्यक्ष डॉ. विश्वनाथ कराड़ की सोच का परिणाम है। 2021 में सरस्वती नदी के तट पर उन्होंने एक मंदिर की स्थापना की थी और उसी दौरान उन्होंने यहां पांडवों की भव्य मूर्तियां लगवाने का संकल्प लिया था। अब उनका यह संकल्प पूरा हो चुका है, और ये मूर्तियां गांव के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को और भी समृद्ध बना रही हैं। श्रद्धालु न केवल मूर्तियों की पूजा-अर्चना करते हैं, बल्कि उनकी सुंदरता और प्रभावशाली बनावट को भी सराहते हैं। इस गांव में अब पर्यटकों का तांता लगा रहता है और यह स्थान धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व का केंद्र बन गया है।
स्थानीय विकास में योगदान
मूर्तियों की स्थापना ने न केवल माणा को पर्यटन के नक्शे पर और मजबूती से उभारा है, बल्कि स्थानीय निवासियों के लिए रोजगार के अवसर भी प्रदान किए हैं। पहले केवल बदरीनाथ धाम जाने वाले श्रद्धालु ही माणा तक आते थे, लेकिन अब जोशीमठ, पीपलकोटी और आस-पास के क्षेत्रों से भी लोग इन मूर्तियों को देखने के लिए आ रहे हैं। माणा के ग्राम प्रधान पीतांबर मोल्फा के अनुसार, मूर्तियों के कारण माणा की प्रसिद्धि बढ़ी है, जिससे स्थानीय लोगों की आजीविका में भी सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। यहां आने वाले पर्यटकों की बढ़ती संख्या ने छोटे व्यापारियों को प्रोत्साहित किया है और गांव की आर्थिक स्थिति को भी मजबूत किया है।
पर्यटकों के दिलों में बसी माणा की शांति और सुकून
यहां आने वाले कई पर्यटक मानते हैं कि इस स्थान की शांति और प्राकृतिक सुंदरता एक अनूठा अनुभव प्रदान करती है। लंबे समय बाद इस गांव में पहुंचे शिवम तिवारी कहते हैं कि इन मूर्तियों के दर्शन करना एक विशेष अनुभव है और यहां की शांति उनके मन को सुकून देती है। पर्यटक उत्तम शर्मा ने कहा कि माणा का यह धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व उनकी जिज्ञासा को बढ़ा देता है। यहां लगे झरने, पहाड़ों की खूबसूरती और पांडवों की धातु की मूर्तियां मिलकर इस स्थान को अनोखी पवित्रता प्रदान करती हैं।
माणा गांव अब इन मूर्तियों के कारण श्रद्धालुओं के दिलों में एक विशेष स्थान बना चुका है और यह धार्मिक और ऐतिहासिक धरोहर के रूप में विकसित होता जा रहा है। यहां की प्राकृतिक खूबसूरती और पांडवों की इस कथा को संरक्षित करते हुए यह गांव अपनी सांस्कृतिक धरोहर को अगले स्तर तक ले जा रहा है।